The beautiful Poetry  'Kaise Bataun Ke Tum Mujhe Kitne Achche Lagte Ho' for The Social House is presented by Faizeen Saba Khan and also written by her which is very beautiful and delightful.



About This Poetry :- The beautiful Poetry  'Kaise Bataun Ke Tum Mujhe Kitne Achche Lagte Ho' for The Social House is presented by Faizeen Saba Khan and also written by her which is very beautiful and delightful.

Kaise Bataun Ke Tum Mujhe Kitne Achche Lagte Ho


चलो बात आज उनकी मासूमियत से शुरू करते हैं 
उनकी अदाओं से आज गुफ्तगू आगाज करते हैं

बड़ा भोला सा है वो 
थोड़ा कम बोलता है मगर मेरी सारी बकवास मुंह बंद करके सुनता है
थोड़ी आदतें अम्मी वाली उसमें भी है 
कि मेरे बारे में वो मुझसे ज्यादा सोचता है
मैं कैसे बताऊं सबको 
उसकी अदाओं का सबब 
मुझे उसकी हर बात अच्छी लगती है
मुझसे लड़ना झगड़ना और फिर प्यार से मुझे गले लगाना
मेरे मामूली से नाम को कुछ यूं बुलाना 
मानो उसने मुझे सबा नहीं जन्नत की हूर बुलाया हो
और कैसे बयां करूं उसकी तारीफें 
तारों की गिनती सी लगती हैं 
बेबाक सी उसकी कुछ बातें 
मुझे प्यारी सी लगती हैं
सुनो तुम Yellow में अच्छी लगती हो 
ये कहकर मुझे सारे सूट Yellow दिलाता है 
और मेरी गलतियों पर तुम ऐसे ही तो अच्छी लगती हो 
कहकर उसे Cuteness बताता है
सुनो तुम खूबसूरत बहुत हो तुम्हें सजने की ज़रूरत नहीं है ये कहकर मेरी गंदी सी शक्ल पर भी 
तारीफों के कसीदे वो हजार पढ़ जाता है 
और कुछ इस अदा से वो मुझसे झूठ बोल जाता है

और तुम जो पूछते हो ना मुझसे वो सवाल कि मैं तुम्हें कैसा लगता हूं तो सुनो...
वो जो नाजुक पंखुडियां जिन्हें तुम पलके बुलाते हो 
कसम से झुक के उठती है जितनी दफा भी वो 
हमारा दिल धड़कता है बड़ी ही तेज धड़कन से 
और जब नाम तुम मेरा सबा कह के बुलाते हो 
शहद की सारी मिठास और चासनी की हर तासीर मुझे फीकी सी लगती है
और कैसे बताऊं मै तुम्हे कि तुम मुझे कितने अच्छे लगते हो 

मैं परेशानियों से कोई सफ- ए- ताल्लुक नहीं रखती 
इसलिए सीने में दिल नहीं पत्थर रखती 
और मुखातिब हूं मैं सबसे अच्छी तरह 
इसलिए मशवरे पे निगाहें सबकी सरसरी रखती 
और वो पत्थर जो मेरे सीने पर रखा है कब से 
दिल होता तभी तो धड़कन रखती
बहरहाल तुम बताओ कैरियत अपनी 
मै खुद की बातें शुरू करूं तो बस पे काबू नहीं रखती
कोई तो बात है वो आजकल पिंजरा बंद नहीं रखता 
उसे मालूम है कि इस मौसम में कोई किसी से ताल्लुक नहीं रखता
और मैं तो ठहर जाती हूं एक लम्हें को देखकर शीशा 
नजरें ऐसी नहीं की हर किसी पर रखती 
और मैंने कहा भी था कि मुलाकातों पे वक्त की पाबंदी मैं नहीं रखती
एक ही शख्स है जिससे बातें भी करूं तो मैं घड़ी नहीं रखती 

मुझे सितारों से प्यार बहुत और चांद भी अच्छा लगता है सिर्फ मैं उसकी दीद को बेताब नहीं 
वो भी मुझ पे आशिक लगता है 
अब मेरा उससे ये कहकर झगड़ा रहता है 
चांद को गुरुर बहुत कि सितारों का उसपे पेहरा रहता है 
कि कभी तो आँख लगे रातों को चाँद की 
मेरे कमरे में सितारे बिछे हों
सोच कर कितना अच्छा लगता है
शब-ए-वस्ल तो हर रोज लगता है 
मै जिस पहर भी शक की खिड़की से देखूं 
सिर्फ मैं नहीं वो भी मुझको तकता रहता है

Written By:
Faizeen Saba Khan

                       

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