This beautiful Ghazal 'Humara Aazm-e-safar Kab Kidhar Ka Ho Jaayein' has written by Waseem Barelvi.


 Difficult Word 
अज़्म-ए-सफ़र = यात्रा करने का दृढ़ संकल्प।
रहगुज़र = रास्ता, पथ, मार्ग।
शाख़-ए-शजर = वृक्ष की शाखा।
तन्हाई-ए-सफ़र = एकाकी यात्रा।

Humara Aazm-e-safar Kab Kidhar Ka Ho Jaayein

Humara aazm-e-safar kab kidhar ka ho jaayein
Ye wo nahin jo kisi rahgujar ka ho jaayein 

Usi ko jeene ka haq hai jo is zamane men 
Idhar ka lagta rahe aur udhar ka ho jaayein

Khuli hawaaon mein udna to us ki fitarat hai 
Parinda kyun kisi shaakh-e-shajar ka ho jaayein 

Main laakh chaahun magar ho to ye nahin sakta, 
Ki tera chehra mera hi najar ka ho jaayein 

Mera na hone se kya fark us ko padna hai 
Pata chale jo kisi kam-najar ka ho jaayein 

'Waseem' subh ki tanhaai-e-safar socho, 
Mushaira to chalo raat bhar ka ho jaayein.

(In Hindi)
हमारा अज़्म-ए-सफ़र कब किधर का हो जाएं 
ये वो नहीं जो किसी रहगुज़र का हो जाएं 

उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में 
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाएं 

खुली हवाओं में उड़ना तो उस की फ़ितरत है 
परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाएं 

मैं लाख चाहूँ मगर हो तो ये नहीं सकता 
कि तेरा चेहरा मेरा ही नज़र का हो जाएं 

मिरा न होने से क्या फ़र्क़ उस को पड़ना है 
पता चले जो किसी कम-नज़र का हो जाएं 

'वसीम' सुबह की तन्हाई-ए-सफ़र सोचो 
मुशाएरा तो चलो रात भर का हो जाएं।     

                                 – Waseem Barelvi