This beautiful Ghazal 'Chalo Hum Hi Pahal Kar De Ki Hum Se' has written by Waseem Barelvi.

 Source 
लेखक – वसीम बरेलवी
किताब – मेरा क्या
प्रकाशन –  परम्परा प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण – 2007


 Difficult Words 
बद-गुमाँ = संदिग्ध, अविश्वास।
राएगाँ = व्यर्थ, बेकार।
ज़िंदा-ज़मीरी = जीवित विवेक।
सम्तें = दिशा की ओर।
हमसायगी = पड़ोसी, प्रतिवेशी।
शराफ़त =  शरीफ़ होने का भाव, नेकी, भलाई, कुलीनता, शिष्टता, भद्रता, सज्जनता।


Chalo Hum Hi Pahal Kar De Ki Hum Se

Chalo hum hi pahal kar de ki hum se bad-gumaan kyun ho 
Koi rishta zara si zid ki khaatir rayegaan kyun ho 

Main zinda hun to is zinda-jameeri ki badaulat hi 
Jo bole tere lahje mein bhala meri jabaan kyun ho 

Sawaal aakhir ye ek din dekhna hum hi uthayenge
Na samjhe jo zameen ke gham wo apna Aasmaan kyun ho 

Humari guftugu ki aur bhi samtein bahut si hain 
Kisi ka dil dukhaane hi ko phir apni jabaan kyun ho 

Bikhar kar rah gaya humsaaygi ka khwaab hi warna
Deeye is ghar mein raushan ho to us ghar mein dhuaan kyun ho

Mohabbat aasmaan ko jab zameen karne ki zid thahri 
To phir buzdil usulon ki sharafat daramiyaan kyun ho 

Ummidein saari duniya se 'Waseem' aur khud mein aise gham 
Kisi pe kuch na zaaheer ho to koi meharbaan kyun ho  

(In Hindi)

चलो हम ही पहल कर दें कि हम से बद-गुमाँ क्यूँ हो 
कोई रिश्ता ज़रा सी ज़िद की ख़ातिर राएगाँ क्यूँ हो 

मैं ज़िंदा हूँ तो इस ज़िंदा-ज़मीरी की बदौलत ही 
जो बोले तेरे लहजे में भला मेरी ज़बाँ क्यूँ हो 

सवाल आख़िर ये इक दिन देखना हम ही उठाएँगे
न समझे जो ज़मीं के ग़म वो अपना आसमाँ क्यूँ हो 

हमारी गुफ़्तुगू की और भी सम्तें बहुत सी हैं 
किसी का दिल दुखाने ही को फिर अपनी ज़बाँ क्यूँ हो 

बिखर कर रह गया हमसायगी का ख़्वाब ही वर्ना
दीये इस घर में रौशन हों तो उस घर में धुआँ क्यूँ हो

मोहब्बत आसमाँ को जब ज़मीं करने की ज़िद ठहरी 
तो फिर बुज़दिल उसूलों की शराफ़त दरमियाँ क्यूँ हो 

उम्मीदें सारी दुनिया से 'वसीम' और ख़ुद में ऐसे ग़म 
किसी पे कुछ न ज़ाहिर हो तो कोई मेहरबाँ क्यूँ हो   

                                 – Waseem Barelvi