This beautiful story 'Ye kaha likha hai' has written and performed by helly shah. Short at held in Mumbai.


Yeh Kaha Likha Hai Story 

क्लास सावधान !
क्लास एक साथ लाइन में, Jogging शुरू करेंगे
शुरू कर !

पीटी सर का ये आर्डर सुनते ही क्लास 7th के सभी बच्चें किचन के काली Tiles पर चल रही  उन अदृश्य चीटियों की कतार की तरह ग्राउंड के चक्कर लगाना शुरु कर देते
हर Thursday ब्रेक खत्म होने की घंटी बजते ही सभी बच्चे खेल, कूद, गॉसिप, टिफिन वगैरा छोड़कर ग्राउंड पर असेंबल हो जाते 
क्योंकि गेम्स पीरियड के लिए लेट होने का मतलब था 
'2 round of Jogging extra' 
I think ये एक universal रूल है कि स्कूल में सबसे Strict स्पोर्ट टीचर ही होते हैं और उन्हें अक्सर गब्बर, हिटलर इत्यादि नाम देकर सम्मानित किया जाता है। 
हमारी स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर भी हमें उन्हीं दरिंदों की याद दिलाते थे। 

हर बार गेम्स पीरियड में लड़कों और लड़कियों की दो अलग-अलग हाइट वाइज लाइंस बनती और इस Sequence में,  मैं अपने इगो को बचाते हुए लाइन के कहीं बीचो-बीच खड़ी तो हो जाती 
लेकिन जब Jogging की बारी आती है तो मेरे इगो और स्टैमिना दोनों की हालत मेरे बैग में पड़े उस खाली टिफिन की तरह हो जाती 
लेकिन क्या करें.. कोई choice नहीं था या तो Jogging करो या फिर स्पोर्ट्स सर की डांट का शिकार बनो 

लेकिन जब Jogging खत्म हो जाती तो हम सभी बच्चों को अपनी पसंद का खेल चुनने की इजाजत तो थी 
लेकिन जहां लड़के दौड़कर स्टोर रूम से बॉल, बैट, विकेट वगैरा ले आते और बड़े excitement से ग्राउंड की ओर बढ़ते
वही हम लड़कियों को उसी ग्राउंड के कोने में खो-खो खेलने का आदेश दिया जाता था 
खो-खो एक ऐसा खेल जो ना मुझे भाता था और
ना मुझे कभी अच्छे से आता था
हर बार मैं बस Wait करती कि कब लड़कों का वो फुटबॉल उड़ता हुआ मेरी तरफ आए 
और कब मैं भी उसे जोर की किक लगा कर चिल्ला सकूं "गोल"! 
लेकिन इन दोनों चीजों के होने की possiblity
उतनी ही कम थी जितना कि मेरा Jogging में स्टैमिना
तो कुछ ऐसा ही था मेरे गेम्स रूटिन। 
मैं इससे सहमत तो नहीं थी लेकिन मैं कुछ कह भी नहीं सकती थी 
क्योंकि those were the rules और आप तो जानते ही हैं
स्कूल एजुकेशन को important दे ना दे, रूल्स को important देना कभी नहीं छोड़ते 
और अगर आप आवाज उठाओ तो क्लास के बाहर जाओ 
लेकिन फिर न जाने क्यों एक दिन मैंने आवाज उठाई 
मैं जानना चाहती थी कि क्यों हम हर बार सर की बात सुनकर खो-खो या वॉलीबॉल खेलने लग जाते हममें से तो कितनी लड़कियों को ये खेल पसंद ही नहीं थे
तो मैंने अपने सहेलियों से पुछा क्या तुममें से किसी को कभी फुटबॉल या किक्रेट खेलने का मन किया है??
पहले तो सभी आपस में खुसफुसाने लगी..
फिर जब उन्होंने मेरी ओर देखा तो उनके चेहरे पर साफ साफ क्रांति लिखी थी 
और जहां क्रांति हो वहां रूल्स के लिए तो कोई जगह ही नहीं है।
तो अगले गेम्स पिरियड में Jogging खत्म होने के बाद जैसे ही हम सभी को खेलने की अनुमति मिल गई। 
बाकी सब तो अपने रूटीन में लग गए 
लेकिन मेरे क्लास की लड़कियां अब भी वही खड़ी थी 
हमें वहां खड़ा देख  
हमारे सर भी सोच में पड़ गए 
उन्होंने हमसे पूछा -
"क्या हुआ खो खो नहीं खेलना?" 
हम सभी ने एक आवाज में जवाब दिया 
"नहीं सर, नहीं खेलना" 
मैं आगे आई.... "सर, हमें फुटबॉल खेलना है"
एक सेकेंड के लिए तो मानो सर भी चौंक गए
फिर हमसे बिना आंखें मिलाए कहने लगे "फुटबॉल लड़कियों का खेल नहीं", 
"फुटबॉल एण्ड क्रिकेट ओनली फॉर बॉयज.
"Football and cricket only for boys. 
You play kho-kho, bollyball".
चलो अब जाओ इधर से!!!
हमसे कोई जवाब न पाकर सर ने सोचा... 
He has made himself very clear
तो वो वहां से जाने लगें

ये कहां लिखा है?? 
सर ने मुड़कर देखा तो मैं उनके पीछे खड़ी थी
ये कहां लिखा है सर? कि Football and cricket only for boys
हमारी स्कुल के हैंड बुक में तो ऐसा कोई रूल नहीं

याद रहे मैं क्लास 7th में थी तो स्कूल से हैंड बुक से बड़ा तो मेरे लिए कोई संविधान ही नहीं था 
सर चुप रहे फिर कुछ सोच कर सर बोले -
"लेकिन ग्राउंड पर तो लड़के खेल रहे हैं,
तुम्हारे खेलने के लिए जगह ही नहीं।" 
बात तो उनकी भी सही थी
अब भला लड़कों से ग्राउंड लेके हम लड़कियों को मौका देने से रहे।
अब फिर से सन्नाटा था
फिर हममें से एक लड़की ने सुझाव दिया
सर इतना बड़ा ग्राउंड है एक कोने में कुछ लड़कियां खो-खो खेल रही है ना तो दुसरा कोना पकड़ कर हम भी फुटबॉल खेल लेंगे
Please Sir!!!

ये सुनकर मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई 
जब डांट का डर हमें हमारा हक मांगने से नहीं रोक सका तो जगह की कमी तो हमें महसूस भी नहीं होती 
सर हम सभी लड़कियों को बड़े गुस्से से देख रहे थे 
फिर उन्होंने सिर्फ मुझे अपने साथ चलने के लिए कहा 
अब मैं घबराने लगी थी क्योंकि स्पोर्टस सर और वाइस प्रिंसिपल की यारी दोस्ती के किस्सों का खौफ स्कूल के हर बच्चे में बसा था 
और ऐसा लग रहा था जैसे आज मैं उसकी असलियत से वाकिफ होने जा रही हूं 
लेकिन फिर कुछ और ही हुआ 
सर गेम्स स्टोर रूम की ओर मुड़े और अंदर से एक फुटबॉल लेकर बाहर आए
बाल को मेरी तरफ उछालते हुए कहा "तुम्हे फुटबॉल खेलना आता भी है?" 
मैने बाल को कैंच किया और जवाब दिया,  "सीख जाएंगे सर शुरुआत कहीं से तो करनी होगी" 
वो दिन हमारे लिए किसी जश्न से कम नहीं था उस दिन के बाद से हमारी स्कूल में धीरे-धीरे लड़कियों के लिए Soccer ट्रेनिंग प्रोग्राम भी शुरु हुए 
और हम सभी लड़कियों को आज भी इस बात का गर्व है कि इसमें कहीं ना कहीं हमारा भी एक योगदान है 

दोस्तों!... जिंदगी में ऐसे कई रास्ते हैं जो हमारे धर्म, लिंग, जाति इन सभी पहलुओं के कारण बट जाते हैं 
और ऐसे भी कई रास्ते हैं जो मानो बंद ही हो जाते है चाहे वो रूल्स हो या सालों से चली आ रही रीति-रिवाज विरासत में मानो हम सभी को मौके के बजाय मजबूरियां ही मिली है 
क्या पता मेरी क्लास के उन लड़कों को भी कभी खो-खो खेलने का मन किया हो 
लेकिन उन्हें किसी ने कभी मौका ही ना दिया हो
अधिकार एक ऐसी चीज है जो कभी मांगने नहीं पड़ती 
लेकिन हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां अधिकार मांगना जरूरी है और अगर ना मिले तो आवाज उठाना भी उतना ही जरूरी है 
क्योंकि ऊपर वाले की सभी रचनाओं में हमारी पहचान किसी स्त्री या पुरुष की नहीं, 
बल्कि एक इंसान की है तो एक इन्सान की हैसियत से कहती हूं....

कि "चाहे हर कदम मिले हमें चुनौतियां, 
हमारा हर कदम ही एक इंकलाब है 
सभी के हक की आरजू है ये दुनिया, 
इंसानियत हर चुनौती का जवाब है।" 
धन्यवाद!!

                                         – Helly Shah