This beautiful story 'Made   For Each Other' has written by Rakesh Tiwari. Shots at held on Abhedya Artworks.

'Made For Each Other

इश्क़ वो जो इश्क़ करने वालों को खास बना दें 
इश्क वो जो किताबों में आए तो इतिहास बना दें
इश्क़ कहां ऐसा देखने को मिलता है मगर 
मेरी कहानी के किरदारों से मिलेंगे तो‌ आप
कहेंगे ये तो है 'Made for each other'.

क्योंकि यार ये वो किरदार है जो सफर एक साथ करते थे। एक दुसरे से जाहिर अपने जज़्बात करते थे। इतना कभी हमसे प्यार जताते नहीं, जितना इससे बतियाते हैं हमसे बतियाते नहीं। अम्मा के सारे अबुझे प्रश्नों का उत्तर थी।
इस कहानी में जो किरदार है वो हमारे पिताजी और उनकी रामप्यारी स्कूटर थी
जी हां 90 के दशक की legit legend लव स्टोरीओं में से एक दयाशंकर तिवारी और MH-43 2867 वाली उनकी पिस्ता ग्रिन color की स्कूटर।
अब आप कहेंगे पापा की एक और कहानी?
दरअसल आपकी कहानी में सबसे ज्यादा वही शख्स बात करता है जिससे आपने कभी ज्यादा बात नहीं की पर उससे सीखा बहोत...
और यह तो भईया love at first sight था
यानी कि चलते रहो तो सेहत बनती है कहने वाले सख्त मिजाज वाले हमारे पिताजी 1989 में ही स्कूटर की शोरूम के आगे पिघल गए थे 
मानो जैसे मन ही मन केह गए हो की बजा के यही से धुम धड़ाके शहनाई मैं ले जाऊंगा,
डाउन पेमेंट नहीं हुई तो तुझे EMI में ले जाऊंगा।

तो वही हुआ.. भईया, घर में कलर टीवी आने के पहले कलरफुल मिज़ाज वाली रामप्यारी जैसे ही पिताजी को लेकर बिल्डिंग वाले पार्किंग में आई तो ऐसा लगा कि तिवारी कुल खानदान का पहला प्रेम विवाह संपन्न हुआ जिसमें दुल्हन दूल्हे को गोदी में लेकर आई है और अम्मा के चेहरे पर चिड़ साफ नजर आ रही थी ("ऐसे हमको कभी नहीं लाए जैसे उसको लाए हैं") 
हमने बोला हो गया..

और इसी दिन से शुरू हुआ हमारे पिताजी का extra marital affair
यानी कि 8 बजे कम्पनी की shift खत्म होती थी
पर पिताजी और रामप्यारी तफरी करने के बाद
9:30 बजे रूकते थे एकदम आराम से।
मतलब ये जोड़ी तो हर किसी पे पड़ गई भारी
पिताजी का नाम ही पड़ गया स्कूटर वाले तिवारी

तो ये चलता रहता था अजीब कहानी थी
चलिए सर्विसिंग करना सफाई करना तो एक तरफ है
ये दोनों बात करते थे।
10:00 बजे पिताजी एकदम पोंछा-ओछा मार के
हां तुम जानती हो, हां! बहुत, नहीं ग़लत किया।
और रामप्यारी भी दो बार जैसे हैंडल में हां, नहीं सही कह रहे हो।

बड़ा अजीब था यार इनका चलता ही था 
मम्मी को तो doubt भी हो गया कि कहीं चार साल बाद छोटा-सा स्कूटर ना आ जाए 
पर क्या है ना रामप्यारी ने कभी धोखा भी नहीं दिया ना 
मतलब पेट्रोल वाला जो मार्क है वो जब लाल मार्क से नीचे भी आता
पिताजी जैसे पीठ पर हाथ फेर के कहते और रामप्यारी चलोगी?
उस दिन रामप्यारी उनको मुम्बई से लंका तक लें जाती 
कइसे चमत्कार होता वो तो भगवान जाने
पर एक दिन रामप्यारी ने धोखा दिया
रात के 12 बजके 20 मिनट और सारे पेट्रोल पम्प बन्द 
और पिताजी ये भूल गये की रामप्यारी स्कूटर का इंजन भी है जिसमें पेट्रोल डालना चाहिए।
  अचानक से गाड़ी बंद, पिताजी को कुछ नहीं दिखाई दिया तो बहुत दिल पे पत्थर रख के उन्हें जो गाड़ी के डिक्की में केरोसिन का डब्बा रखा था वहीं बचा था।

बहुत भरे हुए मन के साथ जो है उसमें भर दिया 
और रामप्यारी ने ये ज़ेहर निगल लिया। राणा प्रताप के चेतक की तरह एकदम अपने महाराणा को मुसीबतों से पार ले जा के, जैसे ही Parking Basement में आई, भभक भभक कर बंद।
मैं ये सब खिड़की से देख रहा था 
और उस दिन जब पिताजी रामप्यारी के हैंडल से लिपट कर रोते हुए देखा बिल्कुल वैसे ही जैसे अम्मा हमें कुटने के बाद रोती थी तो हमको लगा नहीं पिताजी के लिए स्कूटर नहीं कुछ और ही है शायद।

और उस दिन के बाद रामप्यारी कभी ठीक-ठाक चल नहीं पाई
एकदम मतलब चलती, नहीं चलती और पिताजी हमेशा उसे देख कर निकल जाते "ठीक तो करूंगा।" ना ठीक वो हुए ना रामप्यारी।
पिताजी को जब पैरालिसिस का अटैक आ गया था तब अम्मा ने कहा था कि कितनी खराब हो गई है चलती भी नहीं बेच दो 
अचानक गोलमाल के तुषार कपूर की तरह उठ गए आएएए... जैसे की कहना चाहते हो मैं बोल नहीं रहा तो बेच दोगे क्या इसे??

उस रात अपनी कार्टन वाली लुंगी पहन कर नीचे गया और रामप्यारी को ऐसे पूछ रहे थे जैसे लगा कि अब कह रहे हो कि तुम्हारे और मेरे पास वक्त कम है वक्त कम ही था 
कुछ दिनों के बाद जब वो नहीं रहे तो
अम्मा ने कहा अब क्या ही काम रह गया है इसका बेच देते हैं और जो पैसे आएंगे इनके 
श्राद्ध जो होता है, 13वें दिन का होता है उसमें लगा देंगे 
इसी बहाने एक श्रद्धांजली भी हो जाएगी और अम्मा की आंखों में अपनी सौतन को निपटाने का प्लान था पूरा
फिर क्या..
बेमन से दे आ गये चलनी तो थी नहीं ₹2000 मिले तेरहवीं का दिन आया 
पैसे मैंने ख़र्च नहीं किए तकरीबन 11 बजे का वक्त था सारे पंडितो ने हाथ में निवाला उठाया और कुछ कहा क्या कहा समझ में नहीं आया
मेरा मन तो कहीं और था मैं चाह रहा था
कि इस वक्त जब पिताजी का आखिरी दिन है तो किसी और को भी यहां होना चाहिए था
मैं सीधे निकल गया वहां से।
2000 रूपए लेके गैरेज वाले के पास गया तो‌ कहा कि भईया लौटा दो यार ये क्या है कल देके गये थे अब 
अअ.. जो है ग़लत बात है यार ये 
तकरीबन मै शाम को गया था जब मन उखड़ गया था तब,
तो उसने कहा देखिए साहब वो तो scrap में चली गई तोड़ दी गई है
और हम जानते हैं कि आप यकीन नहीं करेंगे इसलिए हम जब भी कोई गाड़ी scrap करते हैं तो उसका
वीडियो बना लेते है। ये देखिए.... 
वीडियो से ज्यादा हैरान करने वाला जो बात थी वो थी उस वीडियो का लिया गया वक्त तकरीबन सुबह के 11:00 बजे 
मुझे याद आया कि जिस वक़्त पंडितों ने हाथ में निवाला उठाकर ये कहा कि मोहरत का वक्त है इस निवाले के साथ ही श्राद्ध संपन्न हुआ और आत्मा मोक्ष को प्राप्त हुई 
उसी वक्त रामप्यारी तोड़ी गई है दोनों ने एक साथ ही दुनिया को अलविदा कहा
लौटते लौटते एक बात मेरे जेहन में आयी‌‌
 कि इश्क़ और मोहब्बत को दो तरफा होने की जरूरत ही नहीं है
जरूरी नहीं कि इश्क़ और प्यार करने वाले दो लोग हमेशा
 अच्छी बातें करें हमेशा किसी खूबसूरत जगह पर जाएं 
या एक के जाने के बाद दूसरा उसकी याद में जिंदगी निकाल दे
 इश्क़ तो वो हों जहां आप किसी से बात करें इस बात को जानते हुए भी कि 
शायद वो ताउम्र आपको जवाब ना दे 
जहां किसी खूबसूरत जगह पर ना जाएं 
पर जिस जगह और सफर पर जाएं
वो सफर खूबसूरत हो जाए और जहां एक के जाने के बाद दूसरे का वजूद वही हो जो मुट्ठी खोलने के बाद रेत का
एक और बात आई जेहन में कि इश्क़ ऐसा ही करेंगे कभी करना पड़ जाए अगर 
स्कूटर वाली पिताजी की फोटो देखकर बस एक ही चीज याद आती है शायद इसे ही कहते हैं मेड फॉर ईच अदर।

                                     – Rakesh Tiwari