वह | केदारनाथ सिंह 


'वह' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह में‌‌ संकलित यह हिन्दी कविता 'वह' भी सम्मिलित हैं।

वह

इतने दिनों के बाद
वह इस समय ठीक
मेरे सामने है

न कुछ कहना
न सुनना
न पाना
न खोना
सिर्फ आँखों के आगे
एक परिचित चेहरे का होना
होना -
इतना ही काफी है

बस इतने से
हल हो जाते हैं
बहुत-से सवाल
बहुत-से शब्दों में
बस इसी से भर आया है लबालब अर्थ
कि वह है

वह है
है
और चकित हूँ मैं
कि इतने बरस बाद
और इस कठिन समय में भी
वह बिल्कुल उसी तरह
हँस रही है
और बस
इतना ही काफी है

                                       – केदारनाथ सिंह


Itne dinon ke baad
Wah is samay thik
Mere saamne hai

Na kuch kahna
Na sunna
Na paana
Na khona
Sirf aankhon ke aage
Ek parichit chehre ka hona
hona -
Itna hi kaafi hai

Bas itne se
Hal ho jaate hain
Bahut-se sawaal
Bahut-se shabdon mein
Bas isi se bhar aaya hai labaalab arth
Ki wah hai

Wah hai
Hai
Aur chakit hoon main
Ki itne baras baad
Aur is kathin samay mein bhi
Wah bilkul usi tarah
Hans rahi hai
Aur bas
Itna hi kaafi hai

                                   – Kedarnath Singh