सृष्टि पर पहरा | केदारनाथ सिंह 


'सृष्टि पर पहरा' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

सृष्टि पर पहरा

जड़ों की डगमग खड़ाऊँ पहने
वह सामने खड़ा था
सिवान का प्रहरी
जैसे मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस -
एक सूखता हुआ लंबा झरनाठ वृक्ष
जिसके शीर्ष पर हिल रहे
तीन-चार पत्ते

कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना

उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते

                                      – केदारनाथ सिंह

Jadon ki dagmag khadau pahne
Wah saamne khada tha
Sivaan ka prahri
Jaise muktibodh ka brahmrakshas -
Ek sukhta hua lamba jharnaath vriksh
jiske shirsh par hil rahe
Teen-chaar patte

Kitna bhavay tha
Ek sukhte hue vriksh ki phungi par
Mahaz teen-chaar patton ka hilna

Us vikat sukhaad mein
Srishti par pahra de rahe the
Teen-chaar patte

                                    – Kedarnath Singh