शहर में रात | केदारनाथ सिंह 


'शहर में रात' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

1982 में लिखी केदारनाथ की कविता 'शहर में रात' कविता-संग्रह 'यहां से देखो' से ली गई है। इस कविता में संघर्ष और कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं का जिक्र है। कविता में केदार जी ने बखूबी चित्रण करते हुए कहा है कि पुरा शहर बदल ही क्यों ना जाए पर कुछ चीजें नहीं बदल सकती आज भी बिजली के चमकने और पानी के गिरने का डर, लोग आज भी आजीविका के स्तर और जिंदगी की जद्दोजहद में कोई बदलाव नहीं है।

शहर में रात 

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुआँ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते-भुनगे-आदमी-गिलहरी-गाएँ
यह शहर कि जिसकी जिद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आजादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं जंजीरें

                                       – केदारनाथ सिंह



Bijli chamki, paani girne ka dar hai
Ve kyon bhage jaate hain jinke ghar hai
Ve kyon chup hain jinko aati hai bhasha
Wah kya hai jo dikhta hai dhuaan-dhuaan-sa
Wah kya hai hara-hara-sa jiske aage
Hain ulajh gaye jeene ke saare dhage
Yah shahar ki jisme rahti hai ichhayen
Kutte-bhunge-aadmi-gilahri-gayen
Yah shahar ki jiski zid hai sidhi-saadi
Jyada-se-jyada sukh suwidha aazadi
Tum kabhi dekhna ise sulgte kshan mein
Yah alag-alag dikhta hai har darpan mein
Sathiyon, raat aayi, ab main jata hoon
Is aane-jaane ka vetan paata hoon
Jab aankh lage to sunna dheere-dheere
Kis tarah raat-bhar bajti hain janjeerein.

                                – Kedarnath Singh