पूँजी | केदारनाथ सिंह


'पूंजी' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह में कविता 'पुँजी 'भी सम्मिलित हैं।

पूँजी

सारा शहर छान डालने के बाद
मैं इस नतीजे पर पहुँचा
कि इस इतने बड़े शहर में
मेरी सबसे बड़ी पूँजी है
मेरी चलती हुई साँस
मेरी छाती में बंद मेरी छोटी-सी पूँजी
जिसे रोज मैं थोड़ा-थोड़ा
खर्च कर देता हूँ

क्यों न ऐसा हो
कि एक दिन उठूँ
और वह जो भूरा-भूरा-सा एक जनबैंक है -
इस शहर के आखिरी छोर पर -
वहाँ जमा कर आऊँ

सोचता हूँ
वहाँ से जो मिलेगा ब्याज
उस पर जी लूँगा ठाट से
कई-कई जीवन

                                       – केदारनाथ सिंह

Saara shahar chhaan dalne ke baad
Main is nateeze par pahuncha
Ki is itne bade shahar mein
Meri sabse badi punji hai
Meri chalti huyi saans
Meri chhaati mein band meri chhoti-si punji
Jise roz main thoda-thoda
Kharch kar deta hoon

Kyon na aisa ho
Ki ek din uthoon
Aur wah jo bhura-bhura-sa ek janbank hai -
Is shahar ke aakhiri chhor par -
Wahan jama kar aaun

Sochta hoon
Wahan se jo milega bayaaz
Us par ji lunga thaat se
Kayi-kayi jeevan

                                     – Kedarnath Singh