"आईना" poetry has written and performed by Dhruv Sharma on The Habital's Platform.

आईना

मेरे कमरे में कोई आईना नहीं है 
क्योंकि अपने अक्स को देखने की मुझमें हिम्मत नहीं है 
हालांकि वो अक्सर मुझे दिख जाया करता है आईनों की दुनिया में 
जिसका दरवाजा कभी खुलता है 
काली कढ़ाई में उबलते तेल में,
मुसलसल दौड़ती हुई मेट्रो की खिड़कियों में, सड़क के गड्ढ़ों में जमें बरसात के पानी में, 
स्याह रात सी ख़ामोश मेरे दफ्तर में खड़ी कार्बन फाइबर की दीवार में, 
मगर जब कभी वो मुझे उस पार से देखता है 
मैं सहम जाता हूँ 
क्योंकि मुझे दिखाई देती है दो आँखें 
जो बचपन से आजतक बिल्कुल भी नहीं बदली
मगर बदल गया है उन आँखों को देखने का नज़रिया 
पेशानी पर उभर आयी है कुछ फिकर मंद लकीरें
सूज गए हैं ये फफोटे और तबस्सुम अब सिर्फ दिल में रह जाती है लबों पर नहीं आती 

मैं उससे पूछता हूँ कौन हो तुम  
वो मुझसे वही सवाल दोहराता है 
जवाब शायद हम दोनों के अंदर है 
मगर अब सुख गया फुर्सत का समंदर है
आजकल सवाल सिर्फ सवाल रह जाते हैं 
ये सवाल मेरा सूरत-ए-हाल सुनाते हैं 
ये मुझसे पूछते हैं क्यों गायब तुम्हारी आँखों की शरारत है 
लहज़े की वो हरारत है 
क्यों मनमर्जी लगती है हिमाकत है 
क्या इस पेशे की यही विरासत है 
कि बस आफत, आफत और आफत है
अब चैनों सुकून का लंबा इंतजार होता है 
जो कभी मुफ्त था उसका व्यापार होता है 
मैं उससे नजरें चुरा लेता हूँ ज्यादा देर देख नहीं पाता हूँ 
जो रास्ता आसान हैं फिर वही मुड़ जाता हूँ क्योंकि डर लगता है ये सोच के वक्त न तो रुकता है ना ही लौटता है रोकती है तो बस सांसें 
और कंक्रीट के इस जंगल में कैद ये सांसें, 
कहीं जाया तो नहीं हो रही 
क्या ये कहीं और खर्च होने के लिए बक्शी गई है 
क्या मेरा मकसद कुछ और है 
या फिर ये दौर ही गुलामी का दौर है।
मेरे कमरे में कोई आइना नहीं है 
लेकिन एक दिन.....
एक दिन मैं माजी का टिकट कटा के 
कोशिशों के पहियों पर चलने वाली 
हौसले की ट्रेन पर सवार हो जाऊंगा 
ताकि यादों के स्टेशन पर उतर के जंग लगी 
बेंच पर बैठे हुए अपने बचपन को उठा लाऊं अपने साथ 
इस शहर में और लगा दूं अपने कमरे में एक आइना 
ताकि गायब हो जाएं पेशानी की वो लकीरें 
फिर कभी ना सूजे ये फफोटे 
लौट आए आँखों की शरारत, 
लहज़े की वो हरारत
और लबों पे आने को तरसती वो तबस्सुम।

                                 – Dhruv Sharma