कुछ टुकड़े | केदारनाथ सिंह 


'कुछ टुकड़े' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है। इस कविता के तीन भाग हैं जो आपस में एक दुसरे के साथ जुड़े हुए हैं।  'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' नामक कविता-संग्रह जिनमें सम्मिलित कविता 'कुछ टुकड़े' केदारनाथ सिंह द्वारा लिखित है।

 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' नामक कविता-संग्रह जिनमें सम्मिलित कविता 'कुछ टुकड़े' केदारनाथ सिंह द्वारा लिखित है।

कुछ टुकड़े

1)

जिससे मिलने गया था
उससे मिलकर जब बाहर आया
सोचा, ये जो विराट इमारत है
ब्रह्मांड की
क्यों न हिला दूँ
इसकी कोई ईंट
इस अद्भुत विचार से रोमांचित
अभी मैं खड़ा ही था
कि ठीक मेरे सामने
एक छोटा पत्ता टूटकर गिरा
और मैंने देखा ब्रह्मांड
हिल रहा है।


2)

उस बूढ़े भिखारी को
आज भी देखा
पर आज उस पर दया नहीं आई
दया आई तो खुद पर
कि देखो न इस गावदी को
कि बीसवीं शताब्दी के
इस अंतिम दशक में भी
एक भिखारी पर दया करने की
हिमाकत करता है।


3)

और यह तो आप जानते ही होंगे
पर मेरा दुर्भाग्य कि मैंने इतनी देर से
और बस अभी-अभी जाना
कि मेरे समय के सबसे महान‍ चित्र
पिकासो ने नहीं
मेरी गली के एक बूढ़े रँगरेज ने
बनाए थे।

                                             – केदारनाथ सिंह


1)

Jisse milne gaya tha
Usse milkar jab bahar aaya
Socha, ye jo viraat imarat hai
Brahmand ki
Kyon na hila doon
Iski koi ent
Is adbhoot vichaar se romanchit
Abhi main khada hi tha
Ki thik mere saamne
Ek chhota patta tutkar gira
Aur maine dekha brahmand
Hil raha hai.


2)

Us budhe bhikhari ko
Aaj bhi dekha
Par aaj us par daya nahin aayi
Daya aayi to khud par
Ki dekho na is gaavdi ko
Ki bisvi shatabdi ke
Is antim dashak mein bhi
Ek bhikhari par daya karne ki
Himaakat karta hai.


3)

Aur yah to aap jaante hi honge
Par mera durbhaagy ki maine itni der se
Aur bas abhi-abhi jaana
Ki mere samay ke sabse mahaan‍ chitr
Pikaso ne nahin
Meri gali ke ek budhe rangrez ne
banaye the.

                                     – Kedarnath Singh