जूते | केदारनाथ सिंह 


उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' नामक कविता-संग्रह में‌‌ संकलित यह हिन्दी कविता 'जूते' केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में एक ऐसे जूते‌ की चर्चा है जिसमें धूल लगी हुई है और साथ ही आगे से फटे हुए हैं वह वक्ता बेहद निर्धन होगा जो सभा में आया हुआ था। केदार जी इस कविता में फटे जूते को मुंह बाए जूते से वर्णित करते हैं। अधिकतम कविताओं में  केदार जी ने सीधा प्रहार राजनैतिक अर्थव्यवस्थाआ पर किया है।

'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' नामक कविता-संग्रह में‌‌ संकलित यह हिन्दी कविता 'जूते' केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में एक ऐसे जूते‌ की चर्चा है जिसमें धूल लगी हुई है और साथ ही आगे से फटे हुए हैं वह वक्ता बेहद निर्धन होगा जो सभा में आया हुआ था। केदार जी इस कविता में फटे जूते को मुंह बाए जूते से वर्णित करते हैं। अधिकतम कविताओं में  केदार जी ने सीधा प्रहार राजनैतिक अर्थव्यवस्थाआ पर किया है।

जूते 

सभा उठ गई
रह गए जूते
सूने हाल में दो चकित उदास
धूल भरे जूते
मुँहबाए जूते जिनका वारिस
कोई नहीं था

चौकीदार आया
उसने देखा जूतों को
फिर वह देर तक खड़ा रहा
मुँहबाए जूतों के सामने
सोचता रहा -
कितना अजीब है
कि वक्ता चले गए
और सारी बहस के अंत में
रह गए जूते

उस सूने हाल में
जहाँ कहने को अब कुछ नहीं था
कितना कुछ कितना कुछ
कह गए जूते।

                                      – केदारनाथ सिंह


Sabha uth gayi
Rah gaye jute
Sune haal mein do chakit udaas
Dhool bhare joote
Munhbaye jute jinka vaaris
Koi nahin tha

Chaukidaar aaya
Usne dekha juton ko
Phir wah der tak khada raha
Munhbaye jooton ke saamne
Sochta raha -
Kitna ajeeb hai
Ki vakta chale gaye
Aur saari bahas ke ant mein
Rah gaye joote

Us sune haal mein
Jahan kahne ko ab kuch nahin tha
Kitna kuch kitna kuch
Kah gaye joote.

                                – Kedarnath Singh