घुलते हुए गलते हुए | केदारनाथ सिंह 


‘अकाल में सारस’ ऐसी ही कविताओं का कविता-संग्रह है, जिसमे सन् 1983-87 के मध्य रची गयी कवितायेँ संकलित हैं। जिसमें कविता 'घुलते हुए गलते हुए' भी सम्मिलित हैं।

अकाल में सारस’ ऐसी ही कविताओं का कविता-संग्रह है, जिसमे सन् 1983-87 के मध्य रची गयी कवितायेँ संकलित हैं। जिसमें कविता 'घुलते हुए गलते हुए' भी सम्मिलित हैं।

घुलते हुए गलते हुए 

देखता हूँ बूँदें
टप‍-टप गिरती हुई
भैंस की पीठ पर
भैंस मगर पानी में खड़ी संतुष्ट।
उसके थन दूध से भारी।
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
पूरी ताकत से
थनों को खींचता हुआ अपनी ओर।
बूढ़े दालान में बैठे
हुक्का पीते - बारिश देखते हुए।
हुक्के के धुँए को
बाहर निकलते
और बारिश से हाथ मिलाते हुए।

सहसा बौछारों की ओट में
दिख जाती है एक स्त्री
उपले बटोरती हुई।
बूँदों की मार से
जल्दी-जल्दी उपलों को बचाने की कोशिश में
भीगती है वह
बचाती है उपले।
कहीं से आती है
उपलों से छनती हुई
फूल की खुशबू।
उपलों की गंध मगर फूल की गंध से
अधिक भारी
अधिक उदार

स्त्री को
बौछारों में
धीरे-धीरे घुलते हुए
गलते हुए देखता हूँ मैं।

                                       – केदारनाथ सिंह

Dekhta hoon boondein
Tap‍-tap girti huyi
Bhains ki pith par
Bhains magar paani mein khadi santusht.
Uske than dudh se bhaari.
Prithvi ka gurutvakarshan
Puri taakat se
Thanon ko khinchta hua apni or.
Budhe dalaan mein baithe
Hukka pite - baarish dekhte hue.
Hukke ke dhunaye ko
Baahar nikalte
Aur baarish se haath milaate hue.

Sahsa bauchhaaron ki ot mein
Dikh jaati hai ek stree
Uple batorti huyi.
Boondon ki maar se
Jaldi-jaldi uplon ko bachane ki koshish mein
Bhigti hai wah
Bachati hai uple.
Kahin se aati hai
Uplon se chhanti huyi
Phool ki khushboo
Uplon ki gandh magar phool ki gandh se
Adhik bhaari
Adhik udaar

Stree ko
Bauchharon mein
Dhire-dhire ghulte hua
Galte hua dekhtaa hun main.

                                     – Kedarnath Singh