एक छोटा सा अनुरोध | केदारनाथ सिंह

'अकाल में सारस' काव्य-संग्रह में सम्मिलित कविता 'एक छोटा-सा अनुरोध' केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई हैं। इस कविता में अनाज से दाना बनने के पीछे जो श्रम, योगदान ,सौन्दर्य होता है केदार जी उसे उजागर करना चाहते हैं।

'अकाल में सारस' काव्य-संग्रह में सम्मिलित कविता 'एक छोटा-सा अनुरोध' केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई हैं। इस कविता में अनाज से दाना बनने के पीछे जो श्रम, योगदान ,सौन्दर्य होता है केदार जी उसे उजागर करना चाहते हैं।

एक छोटा सा अनुरोध

आज की शाम
जो बाजार जा रहे हैं
उनसे मेरा अनुरोध है
एक छोटा-सा अनुरोध
क्यों न ऐसा हो कि आज शाम
हम अपने थैले और डोलचियाँ
रख दें एक तरफ
और सीधे धान की मंजरियों तक चलें

चावल जरूरी है
जरूरी है आटा दाल नमक पुदीना
पर क्यों न ऐसा हो कि आज शाम
हम सीधे वहीं पहुँचें
एकदम वहीं
जहाँ चावल
दाना बनने से पहले
सुगंध की पीड़ा से छटपटा रहा हो

उचित यही होगा
कि हम शुरू में ही
आमने-सामने
बिना दुभाषिए के
सीधे उस सुगंध से
बातचीत करें
यह रक्त के लिए अच्छा है
अच्छा है भूख के लिए
नींद के लिए

कैसा रहे
बाजार न आए बीच में
और हम एक बार
चुपके से मिल आएँ चावल से
मिल आएँ नमक से
पुदीने से
कैसा रहे
एक बार... सिर्फ एक बार...

                                               – केदारनाथ सिंह

Aaj ki shaam
Jo bazaar ja rahe hain
Unse mera anurodh hai
Ek chhota-sa anurodh
Kyon na aisa ho ki aaj shaam
Hum apne thaile aur dolchiyaan
Rakh de ek taraf
Aur sidhe dhaan ki manjariyon tak chale.

Chaaval jaruri hai
Jaruri hai aata daal namak pudina
Par kyon na aisa ho ki aaj shaam
Hum sidhe wahin pahoonche
Ek adam wahin
Jahan chaaval
Daana banne se pahle
Sugandh ki pida se chhatpta raha ho

Uchit yahi hoga
Ki hum shuru mein hi
Aamne-saamne
Bina dubhaashiye Ke
Sidhe us sugandh se
Baatchit kare
Yah raqt ke liye achha hai
Achha hai bhukh ke liye
Nind ke liye

Kaisa rahe
Bazaar na aaye bich mein
Aur hum ek baar
Chupke se mil aaye chaaval se
Mil aaye namak se
Pudine se
Kaisa rahe
Ek baar... sirf ek baar...

                                  – Kedarnath Singh