दिशा | केदारनाथ सिंह 


'दिशा' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है। 'दिशा' कविता बाल मनोविज्ञान से संबंधित है जिसमें पतंग उड़ाते बच्चे से कवि पूछता है - हिमालय किधर है? बालक का उत्तर बाल सुलभ है कि हिमालय उधर है जिधर उसकी पतंग भागी जा रही है। हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है , बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं। कवि को यह बाल सुलभ संज्ञान मोह लेता है। कविता लघु आकार की है और यह कहती है कि हम बच्चों से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। कविता की भाषा सहज है।

'दिशा' कविता बाल मनोविज्ञान से संबंधित है जिसमें पतंग उड़ाते बच्चे से कवि पूछता है - हिमालय किधर है? बालक का उत्तर बाल सुलभ है कि हिमालय उधर है जिधर उसकी पतंग भागी जा रही है। हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है , बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं। कवि को यह बाल सुलभ संज्ञान मोह लेता है। कविता लघु आकार की है और यह कहती है कि हम बच्चों से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। कविता की भाषा सहज है।

दिशा

हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्‍चे से पूछा जो स्‍कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर - उसने कहा
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी
मैं स्‍वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है?

                                       – केदारनाथ सिंह


Himaalay kidhar hai?
Maine us bach‍che se puchha jo school ke bahar
Patang uda raha tha

Udhar-udhar - usne kaha
Jidhar uski patang bhaagi ja rahi thi
Main swikaar karun
Maine pahli baar jaana
Himaalay kidhar hai?

                                     – Kedarnath Singh