बसंत | केदारनाथ सिंह 


'वसंत' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'यहाँ से देखों' कविता-संग्रह में यह कविता 'बसंत' भी संकलित हैं।

बसंत

और बसंत फिर आ रहा है
शाकुंतल का एक पन्ना
मेरी अलमारी से निकलकर
हवा में फरफरा रहा है
फरफरा रहा है कि मैं उठूँ
और आस-पास फैली हुई चीजों के कानों में
कह दूँ 'ना'
एक दृढ़
और छोटी-सी 'ना'
जो सारी आवाजों के विरुद्ध
मेरी छाती में सुरक्षित है

मैं उठता हूँ
दरवाजे तक जाता हूँ
शहर को देखता हूँ
हिलाता हूँ हाथ
और जोर से चिल्लाता हूँ -
ना...ना...ना

मैं हैरान हूँ
मैंने कितने बरस गँवा दिए
पटरी से चलते हुए
और दुनिया से कहते हुए
हाँ हाँ हाँ...

                                       – केदारनाथ सिंह


Aur basant phir aa raha hai
Shaakuntal ka ek panna
Meri almaari se nikalkar
hawa mein farfara raha hai
Farfara raha hai ki main uthoon
Aur aas-paas phaili huyi chizon ke kaano mein
Kah doon 'naa'
Ek dridh
Aur chhoti-si 'naa'
Jo saari aawazon ke viruddh
Meri chhaati mein surkshit hai

Main uthta hoon
Darwaje tak jaata hoon
Shahar ko dekhta hoon
Hilaata hoon haath
Aur jor se chillaata hoon -
na...na...na
Main hairaan hoon
Maine kitne baras gawa diya
Patri se chalte hue
Aur duniya se kahte hue
Haan haan haan...

                                  – Kedarnath Singh