अकाल में दूब | केदारनाथ सिंह 


' अकाल में दूब ' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'अकाल में दूब' कविता में भयानक सुखे पर केंद्रित है सुखा पड़ने की गवाही दुब दे रहा है जो सुखे की वजह से उसका अस्तित्व संकट में है ‌और स्थितियां भी यही संकेत दे रही होती है और मंत्रणा करती हैं और अकाल में यदि दूब बची है तो जीवन की आशा भी बची है यह कविता के निष्कर्ष है। 'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह में‌‌ हिन्दी कविता 'अकाल में दूब' भी
संकलित हैं।

अकाल में दूब

भयानक सूखा है
पक्षी छोड़कर चले गए हैं
पेड़ों को
बिलों को छोड़कर चले गए हैं चींटे
चींटियाँ
देहरी और चौखट
पता नहीं कहाँ-किधर चले गए हैं
घरों को छोड़कर

भयानक सूखा है
मवेशी खड़े हैं
एक-दूसरे का मुँह ताकते हुए

कहते हैं पिता
ऐसा अकाल कभी नहीं देखा
ऐसा अकाल कि बस्ती में
दूब तक झुलस जाए
सुना नहीं कभी
दूब मगर मरती नहीं -
कहते हैं वे
और हो जाते हैं चुप

निकलता हूँ मैं
दूब की तलाश में
खोजता हूँ परती-पराठ
झाँकता हूँ कुँओं में
छान डालता हूँ गली-चौराहे
मिलती नहीं दूब
मुझे मिलते हैं मुँह बाए घड़े
बाल्टियाँ लोटे परात
झाँकता हूँ घड़ों में
लोगों की आँखों की कटोरियों में
झाँकता हूँ मैं
मिलती नहीं
मिलती नहीं दूब

अंत में
सारी बस्ती छानकर
लौटता हूँ निराश
लाँघता हूँ कुएँ के पास की
सूखी नाली
कि अचानक मुझे दिख जाती है
शीशे के बिखरे हुए टुकड़ों के बीच
एक हरी पत्ती
दूब है
हाँ-हाँ दूब है -
पहचानता हूँ मैं

लौटकर यह खबर
देता हूँ पिता को
अँधेरे में भी
दमक उठता है उनका चेहरा
'है - अभी बहुत कुछ है
अगर बची है दूब...'
बुदबुदाते हैं वे

फिर गहरे विचार में
खो जाते हैं पिता

                                       – केदारनाथ सिंह


Bhayanak sukha hai
Pakshi chhodkar chale gaye hain
Pedon ko
Bilon ko chhodkar chale gaye hain chinte
Chintiyaan
Dehri aur chaukhat
Pata nahin kahan-kidhar chale gaye hain
Gharon ko chhodkar

Bhayanak sukha hai
Maveshi khade hain
Ek-dusre ka munh taakte hua

Kahte hain pita
Aisa akaal kabhi nahin dekha
Aisa akaal ki basti mein
Doob tak jhulas jaye
Suna nahin kabhi
Doob magar marti nahin -
Kahte hain ve
Aur ho jaate hain chup

Nikalta hoon main
Doob ki talash mein
Khojta hoon parti-paraath
Jhaankta hoon kuon mein
Chhaan daalta hoon gali-chauraahe
Milti nahin doob
Mujhe milte hain munh baye ghade
Baaltiyaan lote paraat
Jhaankta hoon ghadon mein
Logon ki aankhon ki katoriyon mein
Jhaankta hoon main
Milti nahin
Milti nahin doob

Ant mein
Saari basti chhaankar
Lautta hoon niraash
Laanghta hoon kuan ke paas ki
sukhi naali
Ki achaanak mujhe dikh jaati hai
Shishe ke bikhre hue tukdon ke bich
Ek hari patti
Doob hai
Haan-haan doob hai -
Pahchaanta hoon main

Lautkar yah khabar
Deta hoon pita ko
Andhere mein bhi
Damak uthta hai unka chehra
'Hai - abhi bahut kuch hai
Agar bachi hai doob...'
Budbudaate hain ve

Phir gahre vichaar mein
Kho jaate hain pita

                                     – Kedarnath Singh