Jo Mansabo Ke Pujari Pahen Ke Aate Hai | Rahat Indori

Jo Mansabo Ke Pujari Pahen Ke Aate Hai' written and performed by Rahat Indori. This poetry is best Ghazal and Shayari of Rahat Indori.


शब्द अर्थ
मंसब ओहदा, पद।
कुलाह ईरान-अफगानिस्तान आदि देशों में पगड़ी के नीचे पहनी जाने वाली ऊँची नोकदार टोपी, राजमुकुट, ताज।
तौक हँसुली नामक गले का आभूषण, अपराधियों या पागलों के गले में पहनाया जानेवाला लोहे का भारी वृत्ताकार घेरा, कबूतर आदिपक्षियों के गले का हँसुली जैसा प्राकृतिक चिह्न, गले में लटकाई जाने वाली चपरास, गोल घेरा, गुलामी या दासता का जुआ।
अकीक़ लाल कीमती पत्थर।


Jo Mansabo Ke Pujari Pahen Ke Aate Hai

जो मंसबो के पुजारी पहन के आते हैं
कुलाह तौक से भारी पहन के आते है

अमीर शहर तेरे जैसी क़ीमती पोशाक
मेरी गली में भिखारी पहन के आते हैं

यही अकीक़ थे शाहों के ताज की जीनत
जो उँगलियों में मदारी पहन के आते हैं

इबादतों की हिफाज़त भी उनके जिम्मे हैं
जो मस्जिदों में सफारी पहन के आते हैं

                                               – राहत इंदौरी

Jo mansabo ke pujari pahen ke aate hai
Kulaah tauk se bhaari pahen ke aate hai

Ameer shehar tere jaisi keemti poshaak
Meri gali me bhikhari pahen ke aate hai

Yahi akik the shaahon ke taaz ki jeenat
Jo ungaliyon me madaari pahen ke aate hai

Ibadaton ki hifazat bhi unke zimme hai
Jo maszidon me safaari pahen ke aate hai

                                              – Rahat Indori