Hawa khud ab ke hawa ke khilaf hai, Jaani | Rahat Indori

Hawa khud ab ke hawa ke khilaf hai, Jaani written and performed by Rahat Indori. This poetry is best Ghazal And Shayari of Rahat Indori.


शब्दार्थ:

ऐतराफ – मानना; इकरार करना;
शरायत – शरीर
लिहाफ – सर्दियों के दिनों में सोते समय ओढ़ने की रूईदार भारी और मोटी रजाई।
इख्तिलाफ – मतभेद
मुआफ  – माफ़
असास – नींव
शीन-काफ – यह एक उर्दू साहित्यकार थे जिनका पुरा नाम 'शीन-काफ-निजाम़' है। इनका जन्म 26 नवंबर सन् 1947 में जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। सन् 2010 में 
साहित्य अकादमी नामक पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है।

Hawa Khud Ab Ke Hawa Ke....

हवा खुद अब के हवा के खिलाफ है, जानी
दीए जलाओ के मैदान साफ़ है, जानी

हमे चमकती हुई सर्दियों का खौफ नहीं
हमारे पास पुराना लिहाफ है, जानी

वफ़ा का नाम यहाँ हो चूका बहुत बदनाम
मैं बेवफा हूँ मुझे ऐतराफ है, जानी

है अपने रिश्तों की बुनियाद जिन शरायत पर
वही से तेरा मेरा इख्तिलाफ है, जानी

वो मेरी पीठ में खंज़र उतार सकता है
के जंग में तो सभी कुछ मुआफ है, जानी

मैं जाहिलों में भी लहजा बदल नहीं सकता
मेरी असास यही शीन-काफ है, जानी

                                                 – राहत इन्दोरी

Hawa khud ab ke hawa ke khilaf hai, Jaani
Diye jalaao ke maidaan saaf hai jaani

Hume chamakti hui sardiyon ka khauf nahi
Humare paas purana lihaaf hai jaani

Wafa ka naam yaha bhaut ho chuka badnaam
Main bewafa hoon mujhe aetraaf hai jaani

Hai apane rishton ki buniyaad jin sharaayat par
Wahi se tera mera ekhitlaaf hai jaani

Wo meri peeth mein khanjar utaar sakta hai
Ke jung main to sabhi kuch muaaf hai jaani

Main zaahilon mein bhi lahaza badal nahi sakta
Meri asaas yahi sheen-kaaf hai jaani

                                            – Rahat Indori