Saazishein | साज़िशें | Niraj Nidan | The Social House Poetry | Whatashort



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Poetry Title – Saazishein(साज़िशें) 
Written By – Niraj Nidan 

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Saazishein(साज़िशें) Poetry

" ऐसी वैसी बातों से बेहतर है मेरी खामोशी,
या कोई ऐसी बात करो,
जो खामोशी से बेहतर हो "...!

मेरी बुलंदियों पे मुझे छोड़ जाते
तो फिर भी कोई बात थी
मेरी बुलंदियों पे मुझे छोड़ जाते
तो फिर भी कोई बात थी
गर्दिशों में दामन छुड़ा कर
तुमने भी कुछ नया ना किया,
किस्से उनके मशहूर हुए
जो माहिर थे कुछ भी कह जाने में,
मैं हाल-ए-जिंदगी लिखता हूं
मुझे वक्त लगेगा समझाने में... 

जिंदगी की हर शय को मात देकर
हौसलों में इजाफा करता हूं
जिंदगी की हर शय को मात देकर
हौसलों में इजाफा करता हूं
यानी अब मत पूछना मुझसे
कि मैं कैसे जिंदा रहता हूं

कि साज़िशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे
साज़िशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे
छीन लोगे मेरे हक की जमीन या मेरे सर का आसमां निगल जाओगे,
‌साज़िशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे....

थक जाओ जब कर के सारी कोशिशें
मुझे गिराने की,
थक जाओ जब करके सारी कोशिशें
मुझे गिराने की
एक नजर पलट कर देखना,
मुझे पैरों पर खड़ा पाओगे...
एक नजर पलट कर देखना
मुझे पैरों पर खड़ा पाओगे..

खामियां खोजनी है मुझमें
तो शौक से आना,
मेरे चेहरे पर आईना गढ़ा है,
तुम अपने अरमान तोड़ जाओगे...
साजिशें करके मेरे खिलाफ मेरा क्या बिगाड़ जाओगे.....

छीन लो चमक हीरे की
रात की कितनी ही परते चढ़ाकर,
छीन लो चमक हीरे की रात की कितनी ही पड़ते चढ़ाकर,
कल निकलेगा जब सूरज
उसे चमकता ही पाओगे...
साजिशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे.....

कि खींच लो मुझे भले ही कितना
खींच लो मुझे भले ही कितना
तुम अपने झूठ के दलदल में,
मेरे हाथों का सच बड़ा मजबूत है,
मुझे डूबा न पाओगे...
साज़िशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे....

कि एक उम्र से ये ख्वाहिश तुम्हारी,
मुझे हराकर मुझसे बड़ा बनने की,
एक उम्र से यह ख्वाहिश तुम्हारी
मुझे हराकर मुझसे बड़ा बनने की
हो जाओ तुम कितने भी बड़े
मेरे खुदा तो ना हो जाओगे..
साज़िशें करके मेरे खिलाफ
मेरा क्या बिगाड़ जाओगे.....

धन्यवाद!

                                                –Niraj Nidan